बिदा होते वर्ष का अनुभव और आते नये वर्ष पर कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं !
खैर ख़्वाह ख्वाब किये घर द्वार आंगन
छोड़ गया
बागी वीरानियां
तोड़ गया कठपुलिया गहरी दरार की !
बीता बरस असमंजस की उहापोह
पलकों के भीतर
पतिंगों सा बीता
किरकिर रही कोर अंधड़ व्यार की !
कंधों में सपनों का अंधड़ अम्बार लिये
फिर आया नया साल
काल के
कपाल लिखी रेखायें उसको ही पढ़ना है,
स्वागत समारोह में आज जूझा जमाना
भ्रम भारी
भरोसों में डूबा
अचीन्ही शिला शिल्प उसको ही गढ़ना है,
हरी होंगी अमराईयाँ कुछ और कुछ
मुरझाएंगी
रेंगते ख्वाब
झाकेंगे झुक झुक बगिया उस पार की !
भोलानाथ
Friday, 27 March 2026
खैर ख़्वाह ख्वाब किये
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...
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