Friday, 27 March 2026

खैर ख़्वाह ख्वाब किये

 बिदा होते वर्ष  का अनुभव और आते नये वर्ष पर कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं !

खैर ख़्वाह ख्वाब किये घर द्वार आंगन 
छोड़ गया 
बागी वीरानियां 
तोड़ गया कठपुलिया गहरी दरार की ! 

बीता बरस असमंजस की उहापोह 
पलकों के भीतर 
पतिंगों सा बीता  
किरकिर रही कोर अंधड़ व्यार की ! 

कंधों में सपनों का अंधड़ अम्बार लिये 
फिर आया नया साल 
काल के 
कपाल लिखी रेखायें उसको ही पढ़ना है, 

स्वागत समारोह में आज जूझा जमाना 
भ्रम भारी 

भरोसों में डूबा 
अचीन्ही शिला शिल्प उसको ही गढ़ना है, 

हरी होंगी अमराईयाँ कुछ और कुछ 
मुरझाएंगी 
रेंगते ख्वाब 
झाकेंगे झुक झुक बगिया उस पार की ! 

भोलानाथ

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