विसफारित आँखों के उपजे अचम्भे
पाल नहीं धीर धर
परख पूरे आसार
फिर नाथ नथुने से तमतमाते बैल को!
हादसा सा अनुभव वक्ष में समेट के
ओढ़ नहीं और के भरोसे
कूद फांद
आने दे बाड़े में बिदके बिगडैल को!
भय खाते भागे बहुत नाचे रीछों सा
डफली की लय
दीर्घ होती रही
बाल बिकते रहे तैंती गंडो में भरके,
जीने की जिद में हिलाया बहुत पूँछ
फिर पोंछ पिछवाड़ा
साहस बटोरा
पेट का बैर सुग्गे सा पिंजरे में धर के,
पीछा करती रही सिर चढ़े भूत की
आगे पीछे सरकती परछाईयाँ
समझा सही
जब मल मल धुला आँख की मैल को!
सुन शहतूती पुचकार मुख की
भाव सहमति में जब तब
सहज सिर हिलाई के
अनुबंध खोटे प्रक्षेपण के पहले ही टूटे,
हल्दी अक्षत के टीके की होलिहारी
तन मन तीर सा चुभी
मुंह मिट्ठू मित्रता
गडेरी के खेतों में महुआ सा कूटे,
मोहभंग भंगिमा की ताज़ा मुंहजोरी
मिर्ची बघार सी
नथूनों में भर भर
बांध खूंटे से खींच कर नकैल को!
आयुधिया गंध चढ़ी त्योरियां लठ लठैती
क्षम्य नहीं
फूँक बिगुल होने दे
रार रण तोडना है ब्यूह यह विनाश का,
उहा पोह दौर की तमतमाती त्रासदी की
वक्षबेध पीड़ा थमे नहीं
जैसे
छिंगुरिया की नख में रवा दता फांस का,
डुगडुगिया फतबों की रेर सुन सहमे
हिरण सा सकते में हांफे
गांव शहर
बाहुबली रूँध रहा निस्तारी गैल को!
भोलानाथ
Friday, 27 March 2026
विसफारित आँखों के उपजे अचम्भे
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चलते चलते अजाने सफर में
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