चाक़ू चाबुक भाई चारा बटे कटे की
सच्ची सच्ची सीख
समझ न आई
जिगर जिया में पलती रही बिमारी !
उपयुक्त नहीं अब मरहम का उपचार
वैद्य जी
काढ़ा मिश्रित दिव्य रसायन
भर भर घोंटा घोंघा डारो सारी!
विषम विषाक्त जहन से निकले
पिघले सायद
धीरे धीरे पाप परत की
पीड़ा दायक परी हृदय की गांठ,
दशकों का यह मर्ज पुराना
अँकबार भरे है
तन मन जैसे
दूध दही का सींका बंधा पुरानी ठाठ,
बौनी कूद कुलांचों की कोंची
हर कोशिश
देहरी द्वार पटौती आले
विष बुझी बूटियां घिस घिस हारी !
दांत तोड़ती मुक्कों जैसीआह
हलक की
सुई चुभन सी बिधी कलेजा
दया धर्म निर्पेक्ष आड़ सब छोड़,
कदमताल ड्योढ़ी का भभ्भड़
विस्फोटक बर्ताव के
बहते घाव का गुल्ल्क
खुद के बूते ठाढ़े ठाढ़े फोड़ ,
गुलुर गुलुर बतकही के मोहक मर्मी
मुस्कानों के जाल फेंक न
भींच
मुट्ठियां तोड़ किवाड़े भय के भारी !
धुरी बंधे हैं माह प्रहर दिन
रोग विथा के
चुटकी चूरन उपयुक्त नहीं
गहन शोध के विषय वस्तु हैं ये,
बांस चढ़े नट जैसा केवल
पात्र नहीं करतब के
उस्ताज तपी
तन हंता मन क्रम वचन तथास्तु हैं ये,
हूरों वाली जन्नत के तलबगार
बह रहे
तिलिस्मी सुर्रा में
जानें कैसे तालीमों की नातेदारी !
भोलानाथ
Friday, 27 March 2026
चाक़ू चाबुक भाई चारा
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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