Sunday, 21 November 2021

ताल तलाइयां

 ताल तलइयां नदियों झरने

बगुलों की जस पट्टेदारी ! 


जीवित मछली चोंच निवाला 

झिन्ना झरनों के व्यापारी ! 


बरगद फुनगी 

चौपाल चर्चना

गहन मंत्रणाओं के माहिर 

भांप रहे 

गति लहर नदी की,

अपने अपने अड़ी अहम के 

आड़े बहमी 

भीष्म सुनें न 

चीख वेदना 

लहू लुहान सदी की, 


पोखर पानी पूर जिरह में 

महके रंग विरंगी फुलबारी । 


रातोंरात 

कुकुरमुत्तों सा 

घूरे पनप 

शाल सी सुबह सुबेरे की 

गुनगुनी धूप ओढ़ ली,

रही ठिठुरती 

माटी की परवरिश लीद सी 

राह लावारिस 

लंजार जिंदगी 

जिये कोढ़ की, 


मर्ज पुराना बढ़े दिनोंदिन

धरी घाव पर आंख शिकारी । 


माखन मिश्री दूध मलाई 

देत 

फाड़ के बुक्का 

नरियाये अघोरी 

छोर के कछनी फिरका नाचे,

बेसुरे स्वरों की 

पृष्ठभूमि में 

अर्जित 

योग युक्तियों के गुर 

द्वारे द्वारे बांचे, 


बिगुल बजाती गंजों की बारात 

न जाने नख की लाचारी ।


भोलानाथ

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