कब मुखर हुआ जग
देख दहन दर
अंधा गूंगा
चूहों जैसा बिल में छुपा रहा ।
लुटती रही भूमि राम की
पके कान
उपदेश कृष्ण का
चौमासों की बाढ़ बहा !
मरे हुये हाथी के
टूटे हौदों से
अकबरी सल्तनत का
रक्तिम इतिहास
चुनौती देने
फिर बंदूकें तान खड़ा,
ध्वस्त
तरासी बुद्ध की प्रतिमा
बैशाली के
शिलालेख संदेश मिटाने
उन्माद बाबरी
जिद पर अपने आज अड़ा,
दो जीभ एक मुह
कब बोलेंगी
रक्तपात का आलम
जाता नहिं अब और सहा !
तोप तमंचा बारूदी बम
गोलों की गंध बराबर
नथुनों में
पीढ़ी दर पीढ़ी
साजिश
साथ सहादत बनी रही,
थमा नहीं सिलसिला
मिजाज हवाओं का
अनुरूप दशा के
दिशा बदलती
मौसम मधुमास की
रुख रेखा से ठनी रही,
मिटते बाग बगीचों की
कथा व्यथा
अनसुना किया
कोयल का दिल दर्द कहा ।
उम्मीद आश की
लौ जली जो जस तस भीतर
उठा पटक के
झंझावाती झोकों की
साजिश से लड़
सपने नयन सजाये,
चील गिद्ध के जत्थों से
लड़ मरी
जो सोन चिरैया
भरी आंख नभ
कौल उड़ानें दूध नदी के तट
का सुख हिलगाये,
पर्वत पानी लांघ यहां तक
किसी तरह हम आये
बचा रहे
मन का संकल्प गहा ।
भोलानाथ
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