क्या मारा है लाइक
मन आया तो
कर दिया कमेंट !
एक पंक्ति भी पढ़ा नहीं
बेमन
गरपरु सा है हिलगंट !
नाम रजिस्टर में लिखवाने
क्यों पीट रहा है
जबरन ताली,
दम होगा तो खुद मनवा लेगी
कविता है
नाजों की पाली,
जानबूझ
बन समझदार
और शरारत मत कर अंटसंट !
भोलानाथ
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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