गीत के मीत कहाँ मिलते हैं
किसे पड़ी है
रात रात भर
लिखने पढ़ने सुनने की
खातिर जागे कोई !
चार किताबें
पढ़ लेने से
दो दोहे सुन लेने से
नहीं जगा करती कविता
ओढ़ तान कर भीतर सोई !
अथक साधना की
जीवित देवी है
बौद्धिक खींच तान कर
कोई मोहक तस्वीर बनाये,
भृकुटी त्योरी
सांस चढ़ाकर
चौपाल चौतरा मटक मटक कर
ख्याति के खातिर गाये,
फिर भी गाहे बगाहे
सरक सरक कर
देह पखौरों से
गिर जाती है
राम नाम की रंग बिरंगी लोई !
क्या धरा
प्रतीकों की बस्ती में
पीठ पूछ पशु धन की
कभी पाँव नहीं सहलाया,
खड़ी दोपहरी
साथ हिरनिया के
ईंटा पत्थर चूना गारा
ले दीवार नहीं चुनवाया,
पानी पाँव नहीं बोरे
लोरी नहीं नदी
जस तस
छीन झपट ली
बड़ी मछरिया मठा दही की धोई !
कविताई का
ज्ञान बांटते बहुतेरे पंडित
धनी गीत के
गलियों में मिल जाते हैं,
असल गीत को
जीने वाले
दर्द नीर सा पीने वाले
संतों का मुख सिल जाते हैं,
उनके नाम की
हो जाती हैं
खेत खेत की सारी फसलें
हारे थके
किसानों के हाथों की बोई !
भोलानाथ
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