शेष रही जीने को
आगन की चुटकी भर धूप
और कहने को बोरे भर रात है !
सत्य साक्ष्य देगा ?
झूठी गवाही में
एक नहीं झूठों की पूरी बारात है!
अदालती दलीलों में न्याय नहीं
मिलते हैं निर्णय के
बिके हुये फैसले,
संज्ञान कौन लेगा
भूसे के ढेर में राई सा
खोये हैं सपनों के हौसले,
विष पीकर अमर हुआ
उगल गया सूत्र सार
आदमी के हक में केवल सुकरात है !
बची खुची दौड़ धूप से
पिघलाना है बर्फ जमी
भ्रांतियों के ऊंचे पहाड़,
सदा सदा साथ रहे दैत्य पल
खामियों में अवसर तलासते
चढ़े रहे ताड़,
नगरिया नगाड़ों की
बजती रही डुगडुगी
मुफ्त भंडारे की खाली पंरात है !
महंगे प्रवचनों का
सार्थक सार नहीं निकला
मुफ्त में समय किया जाया,
सिर चढ कर ऊंचे बोलता
व्यय का अंक गणित
आय को फूटी आंख नहीं भाया,
टूट फूट संध झिर्रियां
क्यों झांकना
नेत नियत नाते जोड़ने की बात है !
भोलानाथ
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