सुबह से शाम हुई
इतिहास में दर्ज हुआ दिन
सूरज हुआ छायेश !
पढ़ा नहीं फूलों ने
तितली के पखनो में
लिखा गया संदेश !
नियम न तोड़ा
नातेदारी ने
मुह में मुस्का आंख में चश्मा
रहा फ़ासला दो गज दूरी का,
इधर उधर के
भाव हवा में
मन का मकरंद हृदय में घोल के लौटे
रहा न भ्रम मजबूरी का,
चिट्टी पत्री
मजमून लिखावट
खरबूजे सा बदल रहे परिवेश !
चातक चितवन
उपमान चांद के
रंगीन परिधियों में
मुखड़ों के रंग बदलते रहे सदा,
अपने अपने
समय काल में
गाने वालों ने तरह तरह के
बिम्ब बनाये कौसल किया अदा,
अरसे से महामारी में
उलझे हुये हैं
उपमानों के केश !
धन्वन्तरि भी
हुये प्रभावित
जड़ी बूटियों के रस में
दिखता है केवल भौरों का यशगान,
सकते में है
पुष्प वाटिका
खिले फूल कलियों में लिख गये
फिर वही मसौदे अटकी है घट जान,
खटक रही है मन
सभा की चुप्पी
खाली उपवन माली रमा विदेश!
भोलानाथ
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