Thursday, 1 April 2021

मरहम

 मूड़े का मरहम 

इस लंगड़े पाँव में लगे तो 

घाव भरे मिटे पीड़ा 

फिर कुंतल 

गीत लिखूं धरती आकाश के ! 

साजिस की 

इस गहरी खाई को 

किसी तरह पांटू तो चैन मिले

फिर सौंपू 

फागुन की भोर फूल पौधे पलाश के ! 

और किसे टेरुं 

है 

क्या कोई इस भीड़ में 

धन्वंतरि का वंशधर 

जो फाहा लेप धरे,

पता था जिन्हें 

दवा दारू का गुण धर्म 

और ठिकाना

सभी वैद्य 

शोध शाला की मौत मरे,

छपे खबर 

जो दिखावे के दौर में

साफ साफ पढ़ लूं तो चैन मिले

समय रहते 

विस्वास जगे गये दिन तलाश के ! 

सोचता हूँ खोजता हूँ 

संसय के कारक 

किन्तु  

पक्के इलाज का 

सिरा छोर नहीं मिलता,

जानता हूँ 

सूखे 

संवेदन तालाब कुआं झरने 

पानी बिन 

कोई भी फूल नहीं खिलता,

भरोसा है

बादलों की चाल पर 

जो बरसें तो चैन मिले

खोखल में लौटें फिर 

सायद सुग्गे इस आश के !

व्यवस्था 

लाचारी के हांथों 

फुटबाल नहीं बनना 

जूझना है 

स्वीकार हर चुनौती,

अपनी क्षमताओं की 

ऊर्जा सुरक्षित कर 

संभावित हित पर 

आंख धरे 

ठाढ़ी सम्मुख सरौती,

नाव मिले

कोई गंगा के किनारे 

पाप धुलें मन के तो चैन मिले

बनें बिम्ब 

आंखों में उत्सव उल्लास के ! 


भोलानाथ


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