Saturday, 10 April 2021

लिख

 जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

उजाड़ दिया उपवन की 

लोर भरी 

सुंदर हरियाली 

कांपते रहे 

ठाढ़े ठाढ़े भय से रखवारे,

रगड़ रगड़ 

बांध खूंटे से 

साहस कर 

देख नहीं पीछे 

तमाशबीन गैरत के मारे,

भीड़ भाड़ से अलहदा 

अपनी 

अनुभूतियों से सिख !

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

किसी तरह घेर घार 

बेंड बांडे में 

पचने दे खाया पिया 

सल्तनत चारागाह नहीं,

अपने 

भविष्य को सुरक्षित कर 

पढ़ने दे 

गीता और फातिया 

कोई यहां राजा या शाह नहीं,

झरने दे चेहरे से 

जन्मों की रुआ रुआ कालिख ! 

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

कितनी ही 

पीढ़ियों के 

रक्तिम इतिहास का 

मजमून पढ़कर 

कसक काँटों की शेष है,

उसी ढर्रे पर 

चलता तंत्र है 

बदलाव की 

झलक नहीं दिखती 

सब कुछ पिठाहीं अशेष है,

घावों का नमक देख 

मत दे कचहरी सी तारिख !

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख ! 


भोलानाथ

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