गंगा नहा कर
लौटी नहीं तुम प्रिये
बदरंग लमहे
चादर
बदलते रहे सेज के !
स्याही हुये न
कलम हम हुये
कोने कोने से
छूती रही आंख
खाली सतह पेज के !
शिकवे गिले
गीत बुनते रहे
ढलती रही याद
बनके गज़ल.
खोज खुश्बू की
होती रही
झरता रहा
फुलबगियों का छल ,
आते जाते
रहे दिन
रोती रहीं रात
कहते कथा रहे
गजरे धरे मेज के !
गंगा नहा कर
लौटी नहीं तुम प्रिये
बदरंग लमहे
चादर
बदलते रहे सेज के !
स्याही हुये न
कलम हम हुये
कोने कोने से
छूती रही आंख
खाली सतह पेज के !
बिम्ब ताजे हैं
अब भी
जहन में
हमारी मुलाकात के,
शिवालय की
सीढ़ी में बैठे
गुजरे थे
कितने पहर रात के,
देता रहा हमको चन्दा
जैसे अपनी
अनगिन दुआएं
किरणों नहाई
सुगंधित हवा भेज के !
गंगा नहा कर
लौटी नहीं तुम प्रिये
बदरंग लमहे
चादर
बदलते रहे सेज के !
स्याही हुये न
कलम हम हुये
कोने कोने से
छूती रही आंख
खाली सतह पेज के !
खिलखिलाई थी तुम
मुस्कराये थे हम
फूली
सरसों के जैसे,
लगी नजर
किसकी
उजड़ गई बगिया
रहें पतझर में कैसे,
मुहब्बत के
पन्नों में अंकित
हुई जो
छवियाँ तुम्हारी
मिटे न मिटाये बिम्ब रंगरेज के !
गंगा नहा कर
लौटी नहीं तुम प्रिये
बदरंग लमहे
चादर
बदलते रहे सेज के !
स्याही हुये न
कलम हम हुये
कोने कोने से
छूती रही आंख
खाली सतह पेज के !
भोलानाथ
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