दूध नहीं हमने तो घूंट घूंट
जहर पिया !
सांसो का क्या ठट्ठा खिल्ली
कबाड़ जिया !
कैद कोठरी से
झाँक झाँक देखते रहे
महामारी में
लाशों के काफिले,
घर में
घड़ियालों की फ़ौज
और पड़ोसी के वेश में
हमेशा अजगर के बाप मिले,
हमअपने फरके में धरते रहे
दूध दिया !
संजीवनी की खोज में
निकले वर्षा वनों की
भयावह
दलदल में क्या कहते,
बस
तने रहे अपनी मुद्रा में
निहारते उन्हें
उगलती विष धारा में बहते,
गैया की खाल में हरदम
रम्हाने का काम किया !
दिन मागा रात मागा
घूम घूम पूरे संसार में
मुट्ठी भर
दाने की भीख मिली,
असला बारूद हिंसा कुरूप
चेहरा
भयानक बनाने की
ख्वाहिश में चूल हिली,
रैयत की रोटी दाल ख्याल कर
नबाब मिंया !
भोलानाथ
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