Tuesday, 17 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[मिले थे जहाँ आप]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक गणेशोत्सव की पूर्व संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही
इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
न शिकवा
सिकायत
न कोई गिला है
छूकर के सांसें
लौटी हवाओं ने
हमसे कुछ ऐसा कहा है,
सावन सा
झर झर
आँखों का पानी
चाहत की
चौड़ी नदिया में
भीतर ही भीतर मीलों बहा है,
दिल से
दिल की लगी चोट
पैनी गुलेलों से भारी
सह सह
मछरिया तड़प
घाव गहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
कभी धूप
पलक भरता हूँ
मलता हूँ माथे
पसीने की बूंदें
लौटें कभी
शायद उड़ते पखेरू,
समाधि
क्षणों को
उसांसों में अपने
विसर्जित किया है
चितवन मुखर आपकी
किन पलकों में हेरुं,
यादों के
धुँधलाये
दर्पण
में झलके हैं
मौके मिलन के
किताबी ककहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
उदासी शिकन
ख्याल चेहरे में
मौसम की
आई नहीं
धुँधुआई ना समिधा
किसी भी हवन के लिये,
फागुन के अवसर
आये हैं कितने
गुलाबों के वन में
शराबी छुअन
छोड़ा शहद
नीम पी कर जिये,
नाम आये
अगर
आपकी ओंठ में
फिर अहसाह करना
मसौदे वहीं
अब भी फहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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