Sunday, 15 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[बुडकी मार चिरैया]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्........

भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
स्याह सुबेरे
लीपा-पोती
विगापन सी
दिन की धूप अनाडी,
सांझ सुहागन
दीपक बाती
रात नशीली
आँख पिलाये ताड़ी,
भींगा आँचल
प्यास में डूबा
दूध नहाती
पली बिलैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
ठुंकी मेख 
दरबार के भीतर
ठूंठ से
लकवा मार सयाने,
संसद में
घुस घुस के
अजगर रंग बिरंगे
छौने खूब बियाने, 
बरखा का
सच छप्पर जाने
दे रही धमकी
सावन की पुरवैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
करिया कोट
दियाँर चौंकड़ी
वर्दी खाकी
लील रही बुनियाद,
अफसरशाही
मूस के माफिक
जेब कुतरती 
सुने नहीं फ़रियाद, 
चन्दन घिसते
शिला खियानी
सूखी नदियाँ
बढती रही चुटैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !

डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क  – 8989139763

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