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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्........
नीम चढ़ी उर्दू की
हरी भरी
टहनी की
लौंचियों से
जूझ रहा रह रह के
महुये का तोता !
देख पाता जो
हिंदी में बरगद
माटी में
कैसे फूटता
अंग्रेजी का
नरक भरा सोता !
कोढ़ी तजवीजों ने
हिंसक
इतिहास लिखा
अरब ओंठ
फारसी का जूठन
मदरसों में बदला
पत्तलों ने लीली है थाली,
पनघट में फोड़ा
हिंदी की गागर
कुछ दूर साथ
तिनके बहे हैं
फिर पानी
पदचिन्हों ने रोका
करती रही गैया जुगाली,
मरघट का उल्लू
मुखिया बन आया
हिंदी परव का
माइक
पकड़ कर
परदेशी भाषा में रोता !
नीम चढ़ी उर्दू की
हरी भरी
टहनी की
लौंचियों से
जूझ रहा रह रह के
महुये का तोता !
देख पाता जो
हिंदी में बरगद
माटी में
कैसे फूटता
अंग्रेजी का
नरक भरा सोता !
टूटी हैं काठी
हौदे गिरे हैं
नकछिकनी भीतर की
दुबकी देशी चिरैया
उड़ उड़ के
गली खोर
सीख रही परदेशी बोली,
पंखों में बांधे
आकाशी सपने
गांधारी चिंतन
आँखों के पाले
मटमैली मेहनत
थैली में
गिरवी धर चोली,
मुट्ठी का अक्षत
हल्दी भरा है
इतर गंध
अंकित पगडण्डी
बिस्कुट ही मांगे
सोबर का पोता !
नीम चढ़ी उर्दू की
हरी भरी
टहनी की
लौंचियों से
जूझ रहा रह रह के
महुये का तोता !
देख पाता जो
हिंदी में बरगद
माटी में
कैसे फूटता
अंग्रेजी का
नरक भरा सोता !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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