मेरे
अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के
सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक
नवगीत
साहित्यिक सावन की पूर्व संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही
इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
क्या
वादा करें आपसे
टूटी निभाते कमर
देह दुहरी हुई है !
जुमला सा
सुनते हैं
शिकवा सिकायत
शायद मुहब्बत बहरी हुई है !
भीतर की
मजमूनी पाती
पलकों में
आँखों पढ़ी है,
तराशी है
जीवन भर मूरत
जो कई कई जन्मों गढ़ी है,
सूखी
तलैया सी प्यासी
दरारों में
झिल्ली सी ठहरी हुई है !
क्या
वादा करें आपसे
टूटी निभाते कमर
देह दुहरी हुई है !
जुमला सा
सुनते हैं
शिकवा सिकायत
शायद मुहब्बत बहरी हुई है !
बढाओ कदम आओ
अमुआं की छैयां
भूल जाओ गिले,
और हम गीत गायें वही
काफियों से जैसे
मुखड़े मिले,
कह कह
वेफाई की बातें
पनपी भीतर की
खाई गहरी हुई है !
क्या
वादा करें आपसे
टूटी निभाते कमर
देह दुहरी हुई है !
जुमला सा
सुनते हैं
शिकवा सिकायत
शायद मुहब्बत बहरी हुई है !
फूले क़दम
की डारी
डारे हैं हमने
सावन के झूले,
गीतों की बरखा में
मेघदूत बिरह पत्र
गली घाट भूले.
बिरहाकुल यक्ष की
प्राण बसी यक्षणी
कब साँसों से शहरी हुई है !
क्या
वादा करें आपसे
टूटी निभाते कमर
देह दुहरी हुई है !
जुमला सा
सुनते हैं
शिकवा सिकायत
शायद मुहब्बत बहरी हुई है !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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