Monday, 22 July 2013

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक सावन की पूर्व संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्..

तुम्हारे साथ
हम रह कर
कभी राँझा कभी मजनूं
नज़र आये निगाहों में !
कभी खुशियाँ
कभी गम के
दिए लेकररहे हम भी
बरसती बूंद बांहों में !
रचा कर
हाथ में मेंहदी
बुलाया आपने सावन
भरा आँचल भरी अंजुरी,
रिझाया आपने
हर पल
छुअन साँसें रचाया खूब
आँगन की खुली देहरी,
ये घूँघट की
जमा पूंजी
चुराते चोर सा हम ही
नज़र आये निगाहों में !
तुम्हारे साथ
हम रह कर
कभी राँझा कभी मजनूं
नज़र आये निगाहों में !
कभी खुशियाँ
कभी गम के
दिए लेकररहे हम भी
बरसती बूंद बांहों में !
बजीं चूड़ी
बजीं पायल
छुआ जब शंख ओंठों ने
मिटीं सब दूरियां,
इबादत इश्क में टूटीं
बाँहों भरी
करुआ कलाई
पीली चूड़ियाँ,
कांच की किरचन
बिछौनों से
उठाते हम अकेले ही
नज़र आये निगाहों में !
तुम्हारे साथ
हम रह कर
कभी राँझा कभी मजनूं
नज़र आये निगाहों में !
कभी खुशियाँ
कभी गम के
दिए लेकररहे हम भी
बरसती बूंद बांहों में !
पियासी प्यार की बरखा
भिगोया देह को जी भर
पावन प्यार की पाती,
अपूजे इस शिवालय में
जली हो रात दिन तुम ही
देह भर बन के दिया बाती,
छुपाकर नाभि में
खुशबू हिरन सा
सूंघते हम ही
नज़र आये निगाहों में !
तुम्हारे साथ
हम रह कर
कभी राँझा कभी मजनूं
नज़र आये निगाहों में !
कभी खुशियाँ
कभी गम के
दिए लेकररहे हम भी
बरसती बूंद बांहों में !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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