Monday, 15 September 2014

bholanath ke navgeet [ rakhi ]

हाँथ कलाई
खोल खड़ा हूँ
कोई तो
राखी बाँधे!
तिलक लिलार
लगाकर धर दे
पावन
नातेदारी काँधे !
कहने को संबंध
बहुत हैं
चिकने मुंह की
गुलमोहर सी
रंगरीली बातें,
खाली हाथ
परव बीते हैं
बचपन की सौगात
न लौटी
बिन उराव की रातें,
ताजा टटका
जहन की यादें
रह रह बिम्ब
आँख के राँधे !
हाँथ कलाई
खोल खड़ा हूँ
कोई तो
राखी बाँधे!
तिलक लिलार
लगाकर धर दे
पावन
नातेदारी काँधे !
कहने को संबंध
भोलानाथ

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चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...