मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह सामयिक श्रंगार नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
छाती चौड़ी
नदी की
हो गई
भंवर मथानी
लहर ककहरा,
हरी पहाड़ी
आँचल धोये
नागफनी घर
चौपालों
का पहरा,
पियर पपीहा
सगुन
कोयलिया
बाग
बगईचा लाई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
चौंक पूरती
दिखे बिजुरिया
चमक व्योम छू
सावन
छाती मेह,
नेह नगर के
घायल कुनवे
हांथ
पवन के
पाती भेजें गेह,
उखड़ी
सांस
पाँव की
थिरकन
कंठ राग बौराई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
छाती चौड़ी
नदी की
हो गई
भंवर मथानी
लहर ककहरा,
हरी पहाड़ी
आँचल धोये
नागफनी घर
चौपालों
का पहरा,
पियर पपीहा
सगुन
कोयलिया
बाग
बगईचा लाई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
चौंक पूरती
दिखे बिजुरिया
चमक व्योम छू
सावन
छाती मेह,
नेह नगर के
घायल कुनवे
हांथ
पवन के
पाती भेजें गेह,
उखड़ी
सांस
पाँव की
थिरकन
कंठ राग बौराई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
भोलानाथ
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