मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत जन्माष्ठमी पर्व की पूर्व रात्रि की बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
धीरे नहीं
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
डारी
कदम की
चूकी
बंदरिया सी राधा
बांहों में आये,
गोकुल की मटकी
मथानी
कजरी कहरवा
सुनाकर
बिरहा सुनाये,
छू छू पवन
छतियों से सरके
अधभींगा
आँचल
पागल बिजुरिया
गोवर्धन में गूंजे
रह रह
रिझाये कारी बदरिया !
धीरे नहीं
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
गोकुल की
धरती में
कान धर
थिरक रहीं
धूप छाँव गोपियाँ,
यमुना के
तट की
रागिनी रसीली
रीझी हैं
रंगीन टोपियाँ,
कंठों की
प्रणय राग
गीतों में
बदली
टूटें टहनियाँ
काँटों की सगली
मकरंद महके
कुवाँरी पहरिया !
धीरे नहीं
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
डारी
कदम की
चूकी
बंदरिया सी राधा
बांहों में आये,
गोकुल की मटकी
मथानी
कजरी कहरवा
सुनाकर
बिरहा सुनाये,
छू छू पवन
छतियों से सरके
अधभींगा
आँचल
पागल बिजुरिया
गोवर्धन में गूंजे
रह रह
रिझाये कारी बदरिया !
धीरे नहीं
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
गोकुल की
धरती में
कान धर
थिरक रहीं
धूप छाँव गोपियाँ,
यमुना के
तट की
रागिनी रसीली
रीझी हैं
रंगीन टोपियाँ,
कंठों की
प्रणय राग
गीतों में
बदली
टूटें टहनियाँ
काँटों की सगली
मकरंद महके
कुवाँरी पहरिया !
धीरे नहीं
मनमौजी बजाओ
मुरलिया रसीली
कानों से
प्राणों में
उतरे
मेंहदी सी भीगे
भीतर चुनरिया !
नस नस में हूके
कोयल सी कूके
सहगानी
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये
महकाये भीतर
छलके
इतर की गगरिया !
भोलानाथ
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