Friday, 8 August 2014

[भोलानाथ के नवगीत] दिल तो दिल है

दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता हैकुछ दूर तक 
तुम मेरे साथ हो प्रिये 
और रिश्तों के रागी बिखरे पड़े हैं !
सहेजा समेटा 
बहुत इन हाथों से अपने 
कंधों के ढोये जिद पर अड़े हैं ! 
समझाऊं कैसे
रटाऊ तोते के जैसे
खोखल के बाहर 
गुलेलों की शातिर निगाहें
बन कर चुनौती खड़ी हैं,
बचने बचाने को इनसे 
कोई गुरुकुल नहीं है 
जुगत शेष रहने की 
अनगिन विधाएँ
जहन में जंग खाती पड़ी हैं,
तुम ही कहो 
गुर कुछ सीखें प्रिये 
अभी नरम टांठ माटी के कच्चे घड़े हैं ! 
तुलसी सुमति का संज्ञान 
रट कर 
आचरण को अपने भिगोयें
भेंट पायी पुरखों के हाथों 
छलकती गंगाजली से,
विद्रोही उमर के ज्वाला मुखी को पहिना कर सिंगौटी 
सांड़ों सा साधें 
फिर 
वाणी का अमृत ढारें गली से,
पनघट परिंदों सा चहकें
धूप छाँव 
बरखा के भींजे हम भी खड़े हैं ! 
समझौते समय से हमने किये 
रूठे न खीझे किसी से 
ख्वाहिश की 
आगी में जब तब 
उपलों के जैसे सुलगते रहे हैं, 
न जिद की माँ से 
न बाबू को चिंतित किया है
बह निकले पानी सा 
दशा दिशा तय की काट काट चट्टाने 
नदिया के माफिक बहे हैं,
हिलाई न चौखट कभी 
न तोड़े दरवाजे 
जैसे थे वैसे घुये गहरे गड़े हैं !

भोलानाथ
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
भाव है भीतर का ये
कोई चीज नहीं
जिसको चाहें दे दें,
अपने मन का
भ्रम है ऐसा
मनमाफिक हम कर लें,
इसके आगे
सब बेवस हैं
कोई नहीं है विधाता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
करता है ये
आंख से बातें
इसकी अपनी भाषा है,
कहाँ पता है
किसी को भैया
क्या इसकी परिभाश है,
प्रेम रोग का
रजा है ये
भौंरों सा मडराता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
कौन की आंख से
निकलेगा
कौन की आंख समाएगा !
हो जायेगा
किसी का खुद ही
या और को अपना बनाएगा
सब की सही
समझता है
पर अपनी नहीं समझाता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !

भोलानाथ
डा,राधाकृषणन स्कूल के बगल में
एन,एच-7 कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश
भारत -संपर्क-09425885234
मैहर "

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