Monday, 15 September 2014

bholanath ke navgeet [ paimaanon me ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर ! 
मुहब्बत की 
शेष सार संपदा 
कश्तियों में लादे
हवाओं का 
रुख भांपता हूँ 
बैठ कर किनारे,
कसक काँटों की 
जा कर 
गहराइयों में 
मंडप सी लगती है
गतिशील धारा की 
नाव क्या विचारे, 
डूबे जलपोतों पर 
छाई है 
काई की परतें 
मस्तूलों में 
अँकित नहीं 
अब कोई सिकंदर !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
चेहरे में 
लेपे उदासी 
काँपती अंजुरियों का 
गंगाजल आचमन 
उँगलियों की 
संध से बहा, 
ओंठों में 
शब्द नहीं 
समाचार भीतर के 
सांस छपे 
भंगिमायें मानती नहीं 
छाँव का कहा, 
रोबदार पगड़ी की 
सुने नहीं
रेशमी वल्गायें
निर्णय अनिर्णय की 
हिचकियों में 
नाचती छछुंदर ! 
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
बनते बिगड़ते 
संबोधनों की 
उजड़ी चौहद्दी 
फुदकती गिलहरी 
ठिठकी है कबसे 
बरगद की छईयाँ, 
नहाये निचोये से 
निथरे आकर्षण 
रेत के घरौंदों 
घिरा मैं अकेला 
भौंचक्का 
देख रही गईयाँ, 
पंख कटे बगुलों का 
खोया सन्दर्भ
नहीं लौटा 
कौन की प्रतीक्षा में 
बैठा है 
फुनगी का बन्दर !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...