Monday, 15 September 2014

[bholanath ke navgeet ] poonam ki chanda

बादल की
आगोश में
दुबकी ...
पूनम चंदा
जैसे खोखल पाँखी !
बाँध रही है
सावन बरखा
सूरज
हाँथों
हरी घास की राखी !
आया फिर
त्यौहार
खबर सा
सुबह सबेरे
नन्हीं बहना
गुडहल फूल सी
टहनी टहनी फूली,
हल्दी अक्षत
कुमकुम रोली
थाल सजाकर
सूत का बंधन
बाँध कलाई
दफन किया
सारा दुख भूली.
गंगा की
पावन जलधारा
धो धो मईल
जनम से
हुई नाअब तक खाखी !
बादल की
आगोश में
दुबकी
पूनम चंदा
जैसे खोखल पाँखी !
बाँध रही है
सावन बरखा
सूरज
हाँथों
हरी घास की राखी !
भोलानाथ

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