महामारी का खूनी दौर है
सचेत रहें
अपनों का ध्यान रहे !
आस्वासन राजा के
फिस्स हुये
इंतजाम नरदों में खूब बहे !
लच्छेदार ऊंचे ऊंचे पहाड़ चढ़
जाने की
बोल गये मन की बात,
बने रहो बौरे सुनते रहो
पूंछेगे
सूरज से ढलने दो रात,
लपर झपर
पहरेदार हुये बहरे
सुनें नहीं काल के कहकहे !
चापलूस छदमी मुस्टंडों को
फर्क
नहीं पड़ता मरे जिये कोई,
विलाप महामारी का
मरघट तक सीमित है
जब तक रैयत है सोई,
पाखंडियों के राजभोगों का
बोझ मर खपकर
वक्ष में बहुत सहे !
रहे इनके आसरे तो
अंत नहीं होगा
दारुण दुखों का हमारे,
लड़ना है मिलजुल कर
हालात से
नहीं रहनाऔर किसी के सहारे,
मुह मुस्का दो गज की दूरी
सेनेटाइजर
की शीशी हाथ गहे !
भोलानाथ
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