गीत गाऊं
या सुनाऊं आप बीती
तुम बताओ साथिया
करती हैं
भ्रमित मुझे जाल पुरी वीथियाँ !
खंडहर हवेली का
गुर गौरव खाकर
बैठक में
अपने विस्तार को
चक्र व्यूह बुनती हैं चीटियाँ !
समयगत चुनौतियों से
जूझने की सूझ
समझ नजर नहीं आती,
देखिये जुर्रत
धमकाती इतिहास के सिकंदर की
हाथ लिखी पाती,
नई सुबह
सूरज की स्वर्ण किरण
स्वीकार नहीं जिनको
खाक देंगे
राष्ट्र को नेत नियत नीतियां !
गौरव गाथा की
तेज मुहिम के आगे
खोदेंगे खंतियाँ नकारे,
शंबूक बध की हाय तौबा
और वहीं कल्पित हैं
राम के नारे ,
दिवा स्वप्न देखती
भीड़ का एक नहीं
चेहरे बहुत हैं
कंधों में
धरे हुये तेजधार गैंतियाँ !
विकास के अध्यायों में
कलमकारों की
आपस में ठनी हुई,
लक्ष्य बहुत दूर है
अदला बदली पगड़ी की
परम्परा धनी हुई,
जिरह जोर
अजमाइस के दांव पेंच
अपने
संदर्भों से बंधे रहे
और बंधी रहीं रीतियां !
भोलानाथ
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