मेरे अपने मन के लेखे
आस पास जो महापुरुष थेबैठे हैं चुप
क्यों
मुह में दही जमाये !
सरेख रहे अपनी जमीन
या खेमे के
खतरनाक मंसूबों पर
चूहों के जैसे
बिल में सभी अमाये !
जिसकी लाठी
भैंस उसी की
ऐसे
तामस संदेशों की
नाक नकैल की खातिर
खोल सुमेडी रस्सी भांजी है,
दृष्टि साफ रहे
सदा सदा
इसीलिए कजरौठी का
सारा काजल ऊपर नीचे
पलक बिरौनी
सुरमे जैसे आंजी है,
जोड़ घटी न जाने
फिर भी
मूड़े मूड़े फिरै लठैती
आर्य भट्ट के शिला लेख पर
अपना नाम लिखाये!
लतखोरी के आदि पुरुष हैं
मुह माईक
फोटो चस्पा कर
डुगडुगी बजाते
जैसे सजा का
शाही फरमान सुनायें,
ऐसे जितने अहम के रोगी
सींग हिलाते
दिखें अगाड़ी
फिर पीठ पिछाड़ी उनके
क्यों न
हम भी लट्ठ बजायें,
अनुयायी नही
हरिश्चन्द्र के
साधक हैं मर्यादा के
पदचिन्ह पूजते
जन्म से अपने राम के आये !
बैसाखी का
सफर नहीं था
कहीं का ईंटा
कहीं का रोड़ा
भानुमति के कुनवे से
हमने रिश्ते रखे नहीं,
जितना
चल पाये खूब चले
हाथ पांव नहीं फूले
भैंस बीन के आगे
हाथ पसारे
और किसी को दिखे नहीं,
अपने पाँव
पसुरियों के बल
रंग बिरंगे पखने हरदम
झुंड में
उड़ती चिड़ियों के गिनते आये !
भोलानाथ
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