सुखद सहज
मानस का आयोजन
फारे डारे
कपार बबुआ !
गाये चिल्लाये
किसकी लाचारी से
कितनाअनजान लछुआ !
श्री हरि चरणों तक
पहुंचे न पहुंचे
बंटहरों की भेजी
स्वर लहरी धारा,
सुधि जन
सब खोज रहे बृंदावन
मौलिक नींद का
सरयू का छोड़ कर किनारा,
नंदन जयघोष के
नर्तन में मस्त है
चुंगी फूक पछुआ !
अखंड नहीं
खंड खंड जोड़ती
सभ्यता के
पोषक बन बैठे जाने अनजाने,
स्वयं प्रभा
बुद्धि के मुहाने तक
पहुंच नहीं
चातक सा स्वाति में हिराने,
अपनी खरगोसी तंद्रा में
अटल रहे
सफल रहा कछुआ !
बंदरबुद्धि
फांद की धमक में
हिलाता है जब तब
पीपर की ऊंची डरैयां,
घोसले से अपने
बाहर निकल कर
पड़ोसी को कैसे
सिखायें सलीका चिरैयां,
पूर्णाहुति के
मंत्र सुन
डसता रहा पीठ पांव बिछुआ !
भोलानाथ
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