Saturday, 11 May 2013

[भोलानाथ के नवगीत] अंतहीन शब्दों के जाल में

एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
प्राण भेदी चितवन
एक नज़र
हम पर भी डारो,
लहरों में
बनाये  
रेत के घरौंदे उबारो,
मीरा संग राधा
आज रास तुम नाचो
साथ में हमारे!
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
यमुना की
लहरी में झांके
पूनम की चंदा,
तुम भी निहारो
कमल मुख कलियाँ  
डारो फंदा,
आँचल का फागुन
पलाशों का फींचा
गलियाँ निहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
डारे कदम की
डारी हमने
बाहों के झूले,
प्राणों में मेहदी
अमलतास
साँस फूले,
खेलेंगे हम भी
गोकुल की होली
प्रीत के सहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.- कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत


अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
रंगे चंगे
पिपर ठूँठों को
दे दी डकैतों ने
बरगद की शंज्ञा
बजाकर नगाड़े,
उंगली के
अभिनय में
नाच रहीं कठपुतली
भौंचक हैं देख कर
व्यास के अखाड़े,
श्रद्धा हीन
नीम की निमौरियाँ
खुजलाती
आँख की बिरौनियाँ
कर्पूर
नकुओं में ऊगा
जूड़े में
बेले की वेणियाँ
मछली के
जबड़ों में नदिया उधार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
लगातार
दिशा हीन
दौड़ जारी है
लौटे दिन घूरों के
ऊगे हैं झरबेरी जरबे,
मछुओं के जाल फंसी
जलपरियाँ
खींच तान
खरियों से हीचीं
टूटे हैं मुरबे,
दूध धुले
कंठों के गीत गये
पनघट
सोहर सगुन घट रीत गये
सरफूंदी
का याद है दगा
झूठी रस्म हैं
ओंठ पनबिरियाँ
पतरोई
पतझर का फैला अम्बार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
इंद्रधनुषी
जिल्दों के भीतर
गुणवत्ता दिखे नहीं
पसरा है केवल
खाली सन्नाटा,
ओढ़ कर
विज्ञापित शालें
मासूम आँतों को
पेटों के पनपे
दांतों ने काटा,
प्राणों
सधी हैं गुलेलें
बाँहें
उँगली से खेलें
कोयल लुकी है
मूद कर रगा
देखती
रही हैं आँख हेड़ियाँ
गुब्बार
उठता रहा कारवां बिमार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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