मेरे
अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के
सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक
नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी
प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब
दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के
केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और
सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है
मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की
आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते
पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने
हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर
वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...खेल खेल जज्बातों से
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
बताऊँ मैं कैसे
समझाउं मैं कैसे
न अपनी
राहें अलग हैं
न अपने
दिल ही जुदा हैं,
तुमसे हम दूर हैं
कितने मजबूर हैं
न मंदिर की
देवी हो तुम
न मस्जिद के
हम ही खुदा हैं,
न ठूंठों को सींचा
न ऊँटों को खींचा
रेतीले टीलों का
अनुभव कुछ ऐसा रहा है
दिल से ही दिल
यों हलाल हो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
न भनक
दूरियों की
न खनक चूड़ियोंकी
भीड़ भाड़े के
सूने हैं दिन
और सूनी हैं रातें,
बिम्ब सभी
प्यार के
आंख में उधार के
लगते हैं ठगे ठगे
कुचले कनेर की
उजड़ी कनातें,
काँटों में बबूल के
पांव छेदे हैं उसूल के
और छज्जों का खालीपन
पसरा सन्नाटा
ऊब और उबासी को
मौन धो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
रेत के फब्बारों सी
चैत के जवारों की
धुली धुली
यादों में
पहली मुलाकातों की
आधी मुस्कानें,
कथा व्यथा गाँव की
अमुआं के छाँव की
भरती हैं भीतर
चौकड़ियाँ
छूटीं जो
पिछली पहचानें,
घरौंदे वे रेत के
हरे हरे चने खेत के
छोटी तलैया के छूटे दिन
नौका बिहार के
बांसुरिया सुनने का
मन हो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०8989139763
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