Friday, 10 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [पलकों की देहरी पर]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक  नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम  बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

पलकों की
देहरी पर
ठहरी है एक याद
वर्तमान
सारा कुछ मेट कर !
भूलने की
कोशिश में
पिया
बहुत बूटियाँ
सिलौंटियों में घेंट कर !
फिर भी
वह मोदमयी
यादगार
थाती सी धरी हुई
अब तलक मिजाज में,
गाँव गली
पनघट की
झाँकियाँ
घुमती हैं
आँखों के ताज में,
इंगित
इजहारों पर
मौन मुख उमेठती है
मौनमुखी
लालिमा समेटकर !
पलकों की
देहरी पर
ठहरी है एक याद
वर्तमान
सारा कुछ मेट कर !
भूलने की
कोशिश में
पिया
बहुत बूटियाँ
सिलौंटियों में घेंट कर !
आँखों में
उमड़ रहे
बादल बरसात के
ओंठों पर
महज वर्जनायें,
तन मन
तटबंध
सभी तोड़ गईं
मेघों की
सहज गर्जनायें,
पल भर को
अर्जित
उपलब्धियां
जाने किस कूल गईं
लेख चित्र भेंट कर !
पलकों की
देहरी पर
ठहरी है एक याद
वर्तमान
सारा कुछ मेट कर !
भूलने की
कोशिश में
पिया
बहुत बूटियाँ
सिलौंटियों में घेंट कर !
प्राण प्रहार
साँसों में
वासित हैं
ताजे स्पर्श
सभी अंगों के,
अनायास
मोड़ों पर छूट गये
एक एक
सेतु सफ़र
खौलती उमंगों के,
शेष सार
सम्पदा
गुर्मेटे टेंट में
उमेठे हूँ
चिलचिले लपेट कर !
पलकों की
देहरी पर
ठहरी है एक याद
वर्तमान
सारा कुछ मेट कर !
भूलने की
कोशिश में
पिया
बहुत बूटियाँ
सिलौंटियों में घेंट कर !


भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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