Saturday, 11 May 2013

हिंदी साहित्य के केंद्र में [भोलानाथ के नवगीत]अंतहीन शब्दों के जाल में

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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
रंगे चंगे
पिपर ठूँठों को
दे दी डकैतों ने
बरगद की शंज्ञा
बजाकर नगाड़े,
उंगली के
अभिनय में
नाच रहीं कठपुतली
भौंचक हैं देख कर
व्यास के अखाड़े,
श्रद्धा हीन
नीम की निमौरियाँ
खुजलाती
आँख की बिरौनियाँ
कर्पूर
नकुओं में ऊगा
जूड़े में
बेले की वेणियाँ
मछली के
जबड़ों में नदिया उधार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
लगातार
दिशा हीन
दौड़ जारी है
लौटे दिन घूरों के
ऊगे हैं झरबेरी जरबे,
मछुओं के जाल फंसी
जलपरियाँ
खींच तान
खरियों से हीचीं
टूटे हैं मुरबे,
दूध धुले
कंठों के गीत गये
पनघट
सोहर सगुन घट रीत गये
सरफूंदी
का याद है दगा
झूठी रस्म हैं
ओंठ पनबिरियाँ
पतरोई
पतझर का फैला अम्बार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !
इंद्रधनुषी
जिल्दों के भीतर
गुणवत्ता दिखे नहीं
पसरा है केवल
खाली सन्नाटा,
ओढ़ कर
विज्ञापित शालें
मासूम आँतों को
पेटों के पनपे
दांतों ने काटा,
प्राणों
सधी हैं गुलेलें
बाँहें
उँगली से खेलें
कोयल लुकी है
मूद कर रगा
देखती
रही हैं आँख हेड़ियाँ
गुब्बार
उठता रहा कारवां बिमार है !
अंतहीन
शब्दों का जाल है
शीशे में
बिम्ब का अकाल है
प्रतीकों को
ग्रहण लगा
शिल्पों में
टूट रहीं छेनियाँ
घिसे पिटे
कत्थ्यों का अनुभव पहार है !
नाम नवगीत पर
जो टिके हैं
कौड़ियों के
दाम पर बिके हैं
लगता कहीं
समाधान ठगा
गाँव गली
कांदो की गेडियाँ
गीतों में
केवल किताबी लंजार है !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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