Friday, 3 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [चींटियों के बिल में]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

चींटियों के
बिल में
हाँथ डार
खोज रहे
मरुथल
वनों का हाथी हिराया !
गोबर
गौशाला में
धूनी धुंआँ
पलक मलते रहे
खेत
इल्लियों ने खाया !
मुनमुनाती रही
बहरे कानों में बगदर
पिघलता रहा शीशा
रह रह
भट्ठी के भीतर,
उबलता रहा लहू
लोहित शिराओं का
तनते रहे
आँख आँगन में
परदेशी तीतर,
शरहद के
शेरों के
बंधे पंजे
खोले ना बन्दर
सोया है
बरगद की छाया !
चींटियों के
बिल में
हाँथ डार
खोज रहे
मरुथल वनों
का हाथी हिराया !
गोबर
गौशाला में
धूनी धुंआँ
पलक मलते रहे
खेत
इल्लियों ने खाया !
चिपकाये
छाती से छौंना
ललछर मुँह बंदरिया
कूद रही
फुनगियों की मोटी डरैया,
नई उलहन की
गोफरी में खीटा
सीका में
आँख धरे
टेय रही मूंछें बिलैया,
सहे पीठ
हौदों की
चाबुक
पहाड़ों के आगे
ऊँटों ने
मूँड न उठाया !
चींटियों के
बिल में
हाँथ डार
खोज रहे
मरुथल वनों
का हाथी हिराया !
गोबर
गौशाला में
धूनी धुंआँ
पलक मलते रहे
खेत
इल्लियों ने खाया !
मृत्यु बोध
मजबूरी तोड़ेगी
ओंठों की फेफरी
पानी की जलती
चिनगी मछलियाँ,
हाँथ की
मशालें लाँघेंगी
संशय शिखर
खोजेंगी बुर्जों में
पनघट की गलियाँ,
चन्दन
की माला
खूंटी ने लीली
जाने न
हठ धर्मी रानी
शनीचर की माया !
चींटियों के
बिल में
हाँथ डार
खोज रहे
मरुथल वनों
का हाथी हिराया !
गोबर
गौशाला में
धूनी धुंआँ
पलक मलते रहे
खेत
इल्लियों ने खाया !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...