Saturday, 18 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [मर खप के]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
बहुत हुआ
परभक्षी बगुलों के
आगे और पीछे
अपनी ही ताकत
नकार कर
पूंछें हिलाते,
बौरों से
देख रहे उनको
हमारे ही
चूल्हों के ईंधन
की होली जलाकर
फगुआ मनाते,
फूटे अंगूठों से
सीखें
गलियों में चलना
तौलें इरादे
फिर देखें
खच्चर की छाती
कितनी तनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
दंतकथा
मर्मों से जाना है
देखा सुना है
हवाओं के आँगे
भूत
परियों सा नाचते,
हिंसा पारायण
गला रेत
डालते डकैती
बनते हैं बाल्मीक
संत सभा
सुधा ग्रन्थ बाचते.
घोड़दाने
खा खाकर
घोड़े खूब हुये मोटे
और जने ख़ूब खच्चर
मोती पगुराते
खच्चर खाक
घोड़े जनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
सुअरमुहीं
थुथुनों की
चारागाह नहीं भारत
कामधेनु कपिला की
उजर बजर
सोन थाती है,
बंदरबांटी
आँखों का
करमूँहां मुखिया
पीपर और बरगद
सा ऊगा
बोझ भरी छाती है,
काटो उखारो
घूरे में फेंको
घरफोरु कुबड़े
होंगे बाराती
मरघटिया बिज्जू
सज धज
दूल्हे बनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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