हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत]
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों के स्नेहस्वरूप आज से
नवरात्रि की पवन बेला माँ शारदा का अभीषेक अपने नवगीतों से माँ के श्री चरणों का वंदन करते हुए इस यज्ञ का श्री गणेश कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं और लाड ,प्यार, दुलार के साथ मुझे आप सभी मित्रों के स्नेहाशीष की विशेष आवश्यकता होगी आशा करता हूँ सभी मित्र मेरे इस अनुष्ठान को संपन्न होने तक मुझे अपने संबल से ओत प्रोत करते रहेगे !.........भोलानाथ
दुर्गेआती है
हो ,,,,,,, हो,,,, हो .... हो .........
दुर्गे आती है
हमें बुलाती है
माँ महिमा गाते हैं,
तुम्हें बुलाते हैं !
दुर्गे आती है
पूछे जाती है
की महिमा गाओगे,
कहो कब आओगे,
भजन बिन मंदिर सुना सुना है !
माँ महिमा गाते हैं
तुम्हें बुलाते हैं !
दुर्गे आती है
पूछे जाती है
कहो कब आओगे,
की महिमा गाओगे
भजन बिन मंदिर सूना सूना है !
माँ दर वाली ने,
माँ वरवाली ने,
कुछ हमसे कहा है,
कुछ हमसे पूछा है,
माँ की सांसों ने,
लरजती आँखों ने,
माँ के गज़रे ने,
माँ के कजरे ने,
फैली बांहों ने,
माँ की आँहों ने,
चांदनी रातों ने,
माँ की बातों ने,
तरसती आँखों ने,
लरजती साँसों ने,
और पूछा मयूरी पाँखों ने !
कहो कब आओगे,
महिमा गाओगे,
भजन बिन मंदिर सूना सूना है !
पहाड़ी वाली ने,
मैहर वाली ने,
कुछ हमसे कहा है,
कुछ हमसे पूछा है ,
तुम्हारे भगतों ने,
गज़ल के मक्तों ने,
पुराने बरगद ने,
हाथ की आमद ने,
खेत खलिहानों ने,
उड़द के दानों ने,
हाथ के ठेलों ने,
माँ के मेलों ने,
काठ के झूलों ने,
महकती फूलों ने,
और पूछा है फूल की कलियों ने !
कहो कब आओगे,
महिमा गाओगे,
भजन बिन मंदिर सूना सूना है !
हो,,,,,,,,,, हो ,,,,,, हो ....... हो.,,,,,
भोलानाथ
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
मन नहीं होता
कुछ कहने का
पाती क्या
भेजूं उज्जैनी !
सूखी है क्षिप्रा
राजकुवंर
खोज रहे
घाट बाट मृगनैनी !
कालीदास का
एकाँतवास
यक्षी
संवादों में उलझा,
पथ विचिलित
मेघदूतों का
वांक्षित संदर्भ
नहीं सुलझा,
आम्रकूट की
सुख छाया में
रगड़ रहे
हांथों की खैनी !
मन नहीं होता
कुछ कहने का
पाती क्या
भेजूं उज्जैनी !
सूखी है क्षिप्रा
राजकुवंर
खोज रहे
घाट बाट मृगनैनी !
अस्त व्यस्त
राजकाज
लोलुप दरबारी
अपनी ही साधें,
भोजपाली
लिफाफे
अनुमानी खिचड़ी
मुह में सब राँधें,
फिरका वयानों में
मस्त हैं
छोड़ कर
मर्यादा पुस्तैनी !
मन नहीं होता
कुछ कहने का
पाती क्या
भेजूं उज्जैनी !
सूखी है क्षिप्रा
राजकुवंर
खोज रहे
घाट बाट मृगनैनी !
वैताली व्यूह में
भूल गये
सत्यवादी
राजा विवेकी,
लादे
पीठाहीं
छलतीं संज्ञायें
बंजारिन सी नेकी,
टूटी
कमर की
खोज रही रैयत
खेतों में खोई हरैनी !
मन नहीं होता
कुछ कहने का
पाती क्या
भेजूं उज्जैनी !
सूखी है क्षिप्रा
राजकुवंर
खोज रहे
घाट बाट मृगनैनी !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763- OLDER POSTS

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
शतरंगी रंगों से
हमने ही
जंगलिया भैंसों के
सींग रँगे
हाथों से
सुअरों के बाड़े सजाये !
आँगन की
हरी भरी तुलसी
दोनों ने
जी भर के रौंदा
लोरे हैं मस्ती में
बस्ती को नरदा बनाये !
खाया है खौंदा है
किया खूब गोबर
उजाड़ी हैं
फूलों की बगियाँ,
दुधमुहीं ओंठों की
फोड़ी है बोतल
विष घोला
दूधों भरी नदियाँ,
सूंघ सूंघ
मनभावन
मादक रंगलियाँ
बांडे के इर्द गिर्द
घूम रहीं
कुतुहल कुतियाँ पूंछें उठाये !
शतरंगी रंगों से
हमने ही
जंगलिया भैंसों के
सींग रँगे
हाथों से
सुअरों के बाड़े सजाये !
आँगन की
हरी भरी तुलसी
दोनों ने
जी भर के रौंदा
लोरे हैं मस्ती में
बस्ती को नरदा बनाये !
बीते इतिहासों की
चिंदियाँ समेटे
हाँकों में
समय सार बीता,
बहिरों ने पढ़ी नहीं
देखा है
गूंगों के ओठों की
सजती गीता,
पूजे बहुत धर्मी
बाबा महाराजों के
रँगे चंगे
चौरे सन्यासी
अंजुरी में
अपने दीपक जलाये !
शतरंगी रंगों से
हमने ही
जंगलिया भैंसों के
सींग रँगे
हाथों से
सुअरों के बाड़े सजाये !
आँगन की
हरी भरी तुलसी
दोनों ने
जी भर के रौंदा
लोरे हैं मस्ती में
बस्ती को नरदा बनाये !
कौवों की कलाबाजी
बगुलों की आँखें
पहचाने
मधुबन की मैना,
खिसियानी बिल्ली
खम्भों से उलझी
कंधों की
बोझ हुई रानी सुनैना,
शदियों से
तलघर में
कोल्हू के
बैल हैं मनीषी
पेटों में बांधे
पथरा पहाड़ी तेल के नहाये !
शतरंगी रंगों से
हमने ही
जंगलिया भैंसों के
सींग रँगे
हाथों से
सुअरों के बाड़े सजाये !
आँगन की
हरी भरी तुलसी
दोनों ने
जी भर के रौंदा
लोरे हैं मस्ती में
बस्ती को नरदा बनाये !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
पलकों बिरौनी सी
ओंठों की टहनी में
फिर बैठा
गीत का पखेरू
खा खा के आगी
उत्सर्जित करेगा
दहकते अँगारे !
चिल्मों का लतधारी
मादक नशे में अघोरी
शिवालय की
पिंडी का
जयघोष करते
कसैले धुंयें के
विषैले फूंक मारे !
सांसों में
सांसत की बीछी
कैसे बचाऊँ
मन के वहम से
भावों की
भावुक तलैया,
उड़ते नहीं क्यों
बैठे हैं
बंद किये आँखें
ठाठ के कबूतर
देख कर
म्यार की बिलैया,
खेतों
खलिहानों के
चौपाली चूहों की
मुह चुपड़ी सह में
कुतरती हैं चुहियाँ
शहादत की सूची
बमीठों के किनारे !
पलकों बिरौनी सी
ओंठों की टहनी में
फिर बैठा
गीत का पखेरू
खा खा के आगी
उत्सर्जित करेगा
दहकते अँगारे !
चिल्मों का लतधारी
मादक नशे में अघोरी
शिवालय की
पिंडी का
जयघोष करते
कसैले धुंयें के
विषैले फूंक मारे !
तिलक धारी
अहम् की
फींची पछारी
अहिल्या बिचारी
सच आँचल का
अंधों को कैसे दिखाये,
दागदार
चंदा फरेबी
अईयासी इन्द्रों का
इन्द्रजाल
पत्थर दिलों को
कैसे पढाये,
पी पी के
विष की घिनौची
उगलती रही वन में
अमृत की नदियाँ
जलती रही मौन
जीती रही आग
अपनी निष्ठां के सहारे !
पलकों बिरौनी सी
ओंठों की टहनी में
फिर बैठा
गीत का पखेरू
खा खा के आगी
उत्सर्जित करेगा
दहकते अँगारे !
चिल्मों का लतधारी
मादक नशे में अघोरी
शिवालय की
पिंडी का
जयघोष करते
कसैले धुंयें के
विषैले फूंक मारे !
शदियों की
घिंचमारी
शोषण की
धुँधुआती चिताओं में
कितने ही
ऋषी मुनी जलते रहे,
लपटों के
भीतर की
आधी अधूरी
कथाओं-व्यथाओं
की पीड़ा
राम बाहर से सुनते रहे,
अताताई हत्यारे
इंद्र देव
बनते रहे
राज करते रहे
वनवासी कुटियों से
सीता हरते रहे
साधु छलिया नकारे !
पलकों बिरौनी सी
ओंठों की टहनी में
फिर बैठा
गीत का पखेरू
खा खा के आगी
उत्सर्जित करेगा
दहकते अँगारे !
चिल्मों का लतधारी
मादक नशे में अघोरी
शिवालय की
पिंडी का
जयघोष करते
कसैले धुंयें के
विषैले फूंक मारे !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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