Saturday, 13 April 2013

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत]चलते चलते


 चलते चलते ही माँ !
चलते चलेते ही
माँ खो जाती हूँ मै !
मंदिर की गली में ही
सो जाती हूँ मै !
गाते गाते ही चुप हो
जाती हूँ मै !
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !
चलते चलते ही माँ
खो जाती हूँ मै !
मंदिर की गली में ही
सो जाती हूँ मै !
गाते गाते ही चुप
हो जाती हूँ मै !
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !
चलते चलते ही माँ
खो जाती हूँ मै !
मंदिर की गली में ही
सो जाती हूँ मै !
दर्शन करते है हम
खुशियों के लिए !
अर्चन करते हैं हम
दुखियों के लिए !
बंद खिडकियों की संधों से
वंदन करने लगे !
सारी दुनियाँ से हम
अम्बे अम्बे कहने लगे !
मैया मैया रटने लगे
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !
चलेत चलेत ही माँ
खो जाती हम मै !
मंदिर की गली में ही
सो जाती हूँ मै !
गाते गाते ही चुप
हो जाती हूँ मै !
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !
तेरी मूरत में माँ
एक स्रष्टि भी है !
आँखों में माँ तेरे
दिव्य द्रष्टि भी है !
देख के तेरा दुलार
झुमने हम लगे !
तस्वीर लेकर तुम्हारी
घूमने हम लगे !
दुर्गे दुर्गे कहने हम लगे !
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !
चलते चलते ही
माँ खो जाती हूँ मै !
मंदिर की गली में ही
सो जाती हूँ मै !
गाते गाते ही चुप
हो जाती हूँ मै !
क्या दया है यही
क्या दुआ है यही !
हाँ दया है यही
हाँ दुआ है यही !.

भोलानाथ

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