Monday, 29 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [कच्ची चमेली]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
धुआं देख
छानी के ऊपर
गिरगिट
भाँपें
आगी चूल्हों की,
लूट रही
बारात नखों से
आँख का
काजल
पलकें दूल्हों की,
बर्फ रजाई
हरी घाटियाँ
धूप सेकते
भूल गई हैं
प्यासा पोखर
सूखी नदिया
ताही कंठ पिघलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
उजले दिवस
नहीं हैं मैले
सुर्ख
बारूदी धोबिन
धोये आग से,
फुनगी
बैठे बाज
चील को
नहीं है फुर्सत
भरी जवानी फाग से,
होम की वेदी
हवन नहीं
हंसी आग है
खड़ी होलिका
गोद में लेकर
वंश पूत को
चाह रही है छलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
ॠषियों की
तपोभूमि में
चूर
हुई हैं
दुर्योधन की जांघें,
सत्य नियोगी
थका नहीं है
औंधी
पाँव पड़ी हैं
फूटी घाघें.
बिजली घर की
चकाचौंध में
देख रहे हैं
जंग लगी
कंदीलों का
जगह जगह से
खूंटी पर ही गलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !


भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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