Saturday, 13 April 2013

भोलानाथ`के नवगीत [लील लील झूठ की गिलौरियाँ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

लील लील 
स्वाद भरी 
झूठ की गिलौरियाँ 
पचने दे रोटियों 
सी पेट में 
उगल उगल 
नीम की निमौरियाँ 
उगल आने दे 
बाहर कड़वी सच्चाई ! 
खोद नहीं 
पुरखों की 
सड़ी गली लाशें 
बाँध नहीं 
खूंटे से घोड़े 
आने दे 
आँगन में धूप को 
देख नहीं 
तेल में अपनी परछाई ! 
नदियाँ 
ना पूंछेंगी 
पर्वत 
ना पूंछेंगे 
और नहीं पूंछेंगे 
पोखर तलैया, 
लोरेगी 
डबरों में 
फूंकेगी छांछ को 
नाक नथुनों की 
जली भुनी 
दूध की बिलैया, 
मरुस्थल में 
चौकड़ियाँ भरते 
सूरवीर ऊँटों की 
आँख से 
झरेगी हताशा 
देख कर 
पहाड़ों की 
खड़ी खड़ी 
चोटियों की नभछूती उंचाई ! 
लील लील 
स्वाद भरी 
झूठ की गिलौरियाँ 
पचने दे रोटियों सी 
पेट में 
उगल उगल 
नीम की निमौरियाँ 
उगल आने दे 
बाहर कड़वी सच्चाई ! 
खोद नहीं 
पुरखों की 
सड़ी गली लाशें 
बाँध नहीं 
खूंटे से घोड़े 
आने दे 
आँगन में धूप को 
देख नहीं 
तेल में अपनी परछाई ! 
उलझ नहीं 
नातों के 
जालों में 
झूल नहीं ठाठों में 
बन करके 
मकड़ी का मुखड़ा, 
मतलब परस्ती 
की रिश्तेदारी 
भेदेगी छाती 
एडी में 
जैसे चुभता 
शीशे का टुकड़ा, 
दोगली 
दिशाओं की 
कजरारी आँखों का 
रहमहीन 
सूखा संवेदन 
छान छान कर 
झँझरिया से 
फेंकेगा जैसे 
करहैया की माछी सिराई !
लील लील 
स्वाद भरी 
झूठ की गिलौरियाँ 
पचने दे रोटियों 
सी पेट में 
उगल उगल 
नीम की निमौरियाँ 
उगल आने दे 
बाहर कड़वी सच्चाई ! 
खोद नहीं 
पुरखों की 
सड़ी गली लाशें 
बाँध नहीं 
खूंटे से घोड़े 
आने दे 
आँगन में धूप को 
देख नहीं 
तेल में अपनी परछाई ! 
अखबारी 
पन्नों में 
देखो रोज रोज 
छपती हैं 
माटी के 
शेर की ऊँची दहाड़ें, 
सेहरे में सेही 
बाराती चूहे 
उछल उछल 
सजे धजे 
लग्न मंडप की 
रौनक उजाड़ें, 
सिर की शिखा 
लहराते हवाओं में 
माथे में 
खड़िया का 
लेप किये 
शेख चिल्ली 
बने हैं पुरोहित 
भांवर में नागिन 
बाँट रही मौतें बिदाई ! 
लील लील 
स्वाद भरी 
झूठ की गिलौरियाँ 
पचने दे रोटियों 
सी पेट में 
उगल उगल 
नीम की निमौरियाँ 
उगल आने दे 
बाहर कड़वी सच्चाई ! 
खोद नहीं 
पुरखों की 
सड़ी गली लाशें 
बाँध नहीं 
खूंटे से घोड़े 
आने दे 
आँगन में धूप को 
देख नहीं 
तेल में अपनी परछाई ! 

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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