Wednesday, 17 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [हर्सिगार गंध है भीतर]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...See more

हरर्सिंगार
गंध है भीतर
फूले फूल पलाशी
हंसती गाती
सोती जगती
मुझमे बसती
शतरंगी दुनियाँ !  
डरता हूँ
कहीं उजड़ न जाये
ढोल नगाड़े
खूब बजाते
लिए कटारी
घूम रहे हैं
गली गली रमधुनियाँ !
लूटमार की
साजिश रच रच
शीशों के
मंडप महल बनाते,
आँख चढ़ा
जल्लादों के
जिउं मैं कैसे
बचते बचाते, 
मर खपकर
जो किया कमाई
कैसे दे दूँ
हाथ में इनके
कौन बचाये
प्रेतों से 
खोज रहा हूँ गुनियाँ !
हरर्सिंगार
गंध है भीतर
फूले फूल पलाशी
हंसती गाती
सोती जगती
मुझमे बसती
शतरंगी दुनियाँ !  
डरता हूँ
कहीं उजड़ न जाये
ढोल नगाड़े
खूब बजाते
लिए कटारी
घूम रहे हैं
गली गली रमधुनियाँ !
छुपते छुपाते
खोह पहाड़ों
बहती झर झर
हंसती नदियाँ,
रोज रोज
जी लेता हूँ
सांस शरम
आँखों में शदियाँ,
गाँव की आँखों
सपने नहीं उमड़ते
जीते मरते
रमे हैं
रखवारी में 
मन्त्र में झूमें भुमियाँ !
हरर्सिंगार
गंध है भीतर
फूले फूल पलाशी
हंसती गाती
सोती जगती
मुझमे बसती
शतरंगी दुनियाँ !  
डरता हूँ
कहीं उजड़ न जाये
ढोल नगाड़े
खूब बजाते
लिए कटारी
घूम रहे हैं
गली गली रमधुनियाँ !
कौड़ी भर भी
मोल नहीं है जिनका
राजमुकुट से
जुड़े हुये,
ताली पीट
सराहें अंधे
बहिरे टूटे रथ के
धुडे हुये,
हांक लगाती
दौड़ दौड़ कर
खेतों खेतों
सुआ उडाती
नियत न जाने
पहचाने ना
सन्यासी की मुनियाँ !
हरर्सिंगार
गंध है भीतर
फूले फूल पलाशी
हंसती गाती
सोती जगती
मुझमे बसती
शतरंगी दुनियाँ !  
डरता हूँ
कहीं उजड़ न जाये
ढोल नगाड़े
खूब बजाते
लिए कटारी
घूम रहे हैं
गली गली रमधुनियाँ !


भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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