नवगीत "साहित्य के केंद्र में नवगीत" की परिकल्पना स्वर्गीय श्री श्यामनारायण मिश्र जी की परिकल्पना थी और उन्होंने विविन्न नवगीतों से इस परिकल्पना को नवाजा भी असमय ही निर्वाण को प्राप्त होने के कारण उनकी योजनाये पल्लवित नहीं हो पायीं !
कटनी अंचल के कुछ कविओं ने उनकी योजनाओं में फेर बदलकर नवगीत को संबल देने की कोशिश की है किन्तु इच्छा शक्ति की कमी कहें या अपनी ख्याति अर्जित करने की लालसा जिस विषय वास्तु और चर्चा का हक़दार श्याम नारायण मिश्र जी का जीवन रहा है, उस स्तर की कोई सार्थक चर्चा अभी तक सामने नहीं आई है !इतना जरुर दिख रहा है जो लोग नवगीत की बात अब कर रहे हैं मेरे ख्याल से श्री आनद तिवारी ,श्री रामसेंगर जी और ज्योति खरे को छोड़कर, अभी तक नवगीत में पहचान नहीं बन पायी है और मैं तो देखता हूँ और सोचता हूँ तो ऐसा लगता है श्यामनारायण मिश्र जी की पूंछ पकड़ कर लोग बाग़ नवगीत की वैतरणी पार करने की केवल मंशा ही रखते हैं ! ऐसा मैं इसलिए भी कह रहा हूँ की मिश्र जी के हस्त लिखित कुछ पत्र मेरे पास आज भी रखे हैं ! और दूसरी बात यह है की हम दोनों ने १५ दिसंबर १९९१ में नवगीत के सिलसिले में लगभग १ माह तत्कालीन स्थापित नवगीतकारों से उनके घरों में जा जा कर विस्तृत चर्चा किया था ! कुछ नाम मुझे आज भी याद हैं जैसे श्री देवेन्द्र इंद्र जी,कुअंर बेचैन,श्रीमती रमा जी,भारतेंदु मिश्र,श्री राम परिहार,इशक अस्क, राजेन्द्र गौतम दिनेश सिंह, राजेंद्र तिवारी कहानी कर राजेन्द्र यादव आदि नवगीतकारों के साथ व्यापक चर्चा हुई थी! किन्तु आज जब मैं विकिपीडिया में देखा की कुछ बातें तोड़ मरोड़ कर पेश कर दी गई हैं ! ऐसे में मुझे यह लेख लिखने की जरुरत महसूस हुई ! "हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत" की व्यापक परिकल्पना को केवल कटनी अंचल तक सीमित रखकर ७ कवियों का संकलन निकाला गया जबकि उनकी मृत्यु के एक दिन पहले जबलपुर के उनके आवास से ही टेलीफोन पर श्री जगदीश श्रीवास्तव से श्याम नारायण जी की और मेरी वृहद् चर्चा हुई और इस काम को बहुत जल्दी अंजाम देने की बात भी हुई किन्तु नियति को सायद मंजूर नहीं था और योजना खटाई में पड गई ! नवगीत यात्रा को अधूरी छोड़ कर मिश्र जी निर्वाण को प्राप्त हुए !
कुछ मित्रों ने उन्हें समय का देवता कहा मेरे यह बात गले नहीं उतरी सही मायनों में मिश्र जी शब्द शिल्पों प्रतीकों और बिम्बों के देवता या जादूगर थे इसमें कोई दोराय नहीं है और यह कहना अतिशोक्ति भी नहीं है !.............भोलानाथ
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