मित्रो मेरे शहर से आप सभी अच्छी तरह परिचित हैं शारदा पूरी देवी धाम मैहर विश्व विख्यात शहर है! जिस की वजह से इस शहर को प्रसिद्धि मिली है उस महामहिम माँ शारदा को समर्पित आज का यह नवगीत जगत जननी माँ से कुछ शिकवा शिकायत करता हुआ ......
विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
भगवा लबादों में
खड़ियों का चन्दन
पाँपी पाखंडी
अपशकुनी चेहरे
तहखानों में बैठे
निखालिश भभूती की
परसादी बांटे,
दुनियाँ से भगकर
तेरी शरण में
जिया सौंप
माँथ धरे देहरी
कैसी तू बहरी
सूने नहीं छुरियाँ
जमा पूंजी टेंटों की काटें,
रंगीन
मौली की परतों में
परपंची अर्थहीन
छूंछे प्रसंगों की
झूठी कथाओं की
प्रस्तुतियां
सुनती है तू भी
महिमा मंडित लहरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
तुम्हारे ही पांवों में
पलते हैं क्यों
तेगधारी
ऊँची पगड़ी वाले
डाँकू डकैतों के
बंजरिया बीहड़ के
घातक घरौंदे,
तपसी प्रवचनी
लंगोटियाँ
ना बदलीं
देह धरे पुन्य पाप
लोटते अखाडा अनाडी
लीलते हैं तक्षक
बीनों के मार्मिक मसौदे,
बांहों में
बांधे हैं फीते
यक्षों ने
नाग लोक जीते
कबन्धों की
घुस पैठ जारी हैं
अब भी भारी हैं पौरुष में
शेर सी लोखरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
द्वार में तेरे उड़ती हैं
राधा की शालें
मीरा के
फटते हैं आँचल
बंधुआ रखवाली
आँखों में आँजे
तेकुओं से काजल,
सूखा संवेदन
उड़ता बुरादा
जन्मों की श्रद्धा
भीतर भौचक्की
तीरथ से लौटी
अधोगामी अँखियाँ
बहती हैं जैसे नदियों का जल,
आक्षितिजी तारों
ऊँचे पहाड़ों
शिखरों के मुख से
जुडी है तेरी प्रतिष्ठा
फिर कुंठा की पोखर में
गंधाती क्यों है
रह रह के
मन की मछरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
भगवा लबादों में
खड़ियों का चन्दन
पाँपी पाखंडी
अपशकुनी चेहरे
तहखानों में बैठे
निखालिश भभूती की
परसादी बांटे,
दुनियाँ से भगकर
तेरी शरण में
जिया सौंप
माँथ धरे देहरी
कैसी तू बहरी
सूने नहीं छुरियाँ
जमा पूंजी टेंटों की काटें,
रंगीन
मौली की परतों में
परपंची अर्थहीन
छूंछे प्रसंगों की
झूठी कथाओं की
प्रस्तुतियां
सुनती है तू भी
महिमा मंडित लहरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
तुम्हारे ही पांवों में
पलते हैं क्यों
तेगधारी
ऊँची पगड़ी वाले
डाँकू डकैतों के
बंजरिया बीहड़ के
घातक घरौंदे,
तपसी प्रवचनी
लंगोटियाँ
ना बदलीं
देह धरे पुन्य पाप
लोटते अखाडा अनाडी
लीलते हैं तक्षक
बीनों के मार्मिक मसौदे,
बांहों में
बांधे हैं फीते
यक्षों ने
नाग लोक जीते
कबन्धों की
घुस पैठ जारी हैं
अब भी भारी हैं पौरुष में
शेर सी लोखरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
द्वार में तेरे उड़ती हैं
राधा की शालें
मीरा के
फटते हैं आँचल
बंधुआ रखवाली
आँखों में आँजे
तेकुओं से काजल,
सूखा संवेदन
उड़ता बुरादा
जन्मों की श्रद्धा
भीतर भौचक्की
तीरथ से लौटी
अधोगामी अँखियाँ
बहती हैं जैसे नदियों का जल,
आक्षितिजी तारों
ऊँचे पहाड़ों
शिखरों के मुख से
जुडी है तेरी प्रतिष्ठा
फिर कुंठा की पोखर में
गंधाती क्यों है
रह रह के
मन की मछरिया !
नंगे पाँव
छोड़ कर गाँव खेडा
अपना कस्वा कबीला
चिलचिलाती धूप में
आकर किया क्या
कौन लक्ष्य भेदा
तुम्हारे शहर की
छद्मी डगरिया !
दरबारी हादसे
चौपाली चर्चे
अखबारी बैठक में
अलट पलट
पढ़ते पन्ने
कसाई हैं पंडे
गला रेत देख रही
बैठी तू ऊँची पहरिया !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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