Wednesday, 24 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [आँधियों से]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
शदियों की
संस्कारी रुढियों का
पुख्ता पाखंड
निथरेगा बूंद बूंद
कोढ़ी मवाद सा,
गांधारी
आस्था का दौर
अभी जारी है
अधूरी है भीम की प्रतिज्ञा
भीतरी अवसाद सा,
कई कई
जन्मों की
नींद की खुमारी में
बोझिल हैं आँखें
पूरे होसाबास में
अभी नहीं
आई हैं
और न ही जागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
घाटियों की छातियों के
चट्टानी पत्थर
फोड़कर निकलेगा
पिघल पिघल
मौन लाबा का झरना,
फेंक फेंक
कंकड़ियाँ देखना
धागों से
नापना ठहरी गहराई
फिर पार वैतरिणी करना,
उड़ाईं नावें
हवा में
फूंक में
गलाया है
लोहे सा
औरों का पौरुष
भांज भांज कर जलेबियाँ
पानी में पागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
नीतियों के नायक
दे दे दुहाई
पंडित चाणक्य की
बैलों सा जोता
खिंचवाई बग्घियाँ,
ध्वस्त हुये
रंग मंच
टूटे संबंधों के नाटक
चिंदी चिंदी जांघिये की
बिखरी हैं धज्जियाँ,
करबर
पथरियों में
खूब घिसा चन्दन
गमगमाते
हाथों के मुरवे
महक रहीं नदियाँ
घाटों में
फूंक रहे गांजा बैरागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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