Tuesday, 30 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [गूंगे मुह]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
चेहरों का
अक्स नहीं उभरा
तरासेंगी चींटियाँ
चमचमाता आइना
फोड़ कर
पाँव से पहाड़,
बरसाती
मेंढकों से
सुन सुन
गंगा की अमर कथा
कुओं की गुलरियाँ
तोड़ रहीं पानी में हाड, 
गोबर की गौरें
बंदन कर
पूजी हैं
कई कई
नदी ताल झरने
समझी विधायें न
पाथ दिये कंडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
गुर क्या सीखेंगे
बडबोले नेवले
पिया जहर
नागों का
उगल रहे ओंठों से
शब्दों के ऊपर, 
संज्ञायें सूरज की
निगल रही
लोमड़ियाँ 
बंजर के
इतिहासी शिलालेख
गुरुकुल में उगी है थूहर,
चुंगी चिलम के
अखबारी चर्चे
कसे हैं
देवालय धुंआ में
बाना लिये
मुह में
नाच रहे पँडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
सनकी हवाओं की
धमकी दबे पाँव
हलकी सी आहट
सवाली शहर की
हवेली है
कोनों से खंडित,
बरगद की छाती 
अनचाही
पीपल की माया
बामियों बमीठों में
खोज रहा हाथी
जादूगर पंडित,
मुखागर
कहें क्या
सूखी है स्याही
कलम की
ओंठों के
नगमे
कंठों में कैसे हैं ठंडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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