Sunday, 14 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [धूप ढली सिमटी परिछाई]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
कूपों के बाहर
बमीठों के जंगल
चन्दन के
विरवों ने पाले
लाकर जहरीले साँपों को
गंध की डरैया,
चुन चुन कर
चोंच से तिनकों के
घोंसले बनाती है
संशय हीन
झूलती टहनियों की
शीतल छाँव में चिरैया,
सुरमैया
पंखों
भरती उड़ानें
कैसे बचाये
सोने के अंडे
संकट के
सागर में डारे
और कितने गहरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
पीढ़ी दर पीढ़ी
पुरखों की
पुस्तैनी बीनों में
बिच्छु बियाने
भंग पिये खोहों में
सोये हैं कब से संपेरे,
जहरीले साँपों के
फन पर उड़ती
चह्चहाती रोती गौरैया
सिर पर है सूरज
अभी तक न जागे
समय के उधेरे !
जंग लगी
जन्मों की
बीनों पर
सांप
क्या नचायेंगे
चूर हैं नशे में
वंशगत नसेड़ी
कानों के बहिरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
माँदर की
थापों में
छाहुर जगाते
बोल गूंज रहे गाँव में
घोल रहे मिशरी
कानों में बिरहा रसीले,
कंठों की राग
और टिमकी की लय पर
थिरक रही बधुयें
रेतीली आँधियों के
अंधड़ से निकल कर
आये जो कबीले,
अन्तोदय के
द्वार
क्या खोलेंगे
अंधे सिपाही
जालपुरी चौखट पर
चमगादड़
टीलों में
चीलों के पहरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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