खुजली खारिश देह खुजाती
झरें बाल बेतेल
ठंडी थाली
ठंड रसोई मांगे जिया मुगौरा !
तेल न ताई जली तेलाई
पाग पैंतरे
चिंदी चिंदी
उड़े हवा में बगरे अउंटों ठौरा !
सामा पसही पानी पातर धांध पेंदारे
अंचरा
ओलिया
ढांक रहे सदभाव तोड़ती गैंताली,
कमियां कामर लाद ओंठ की
आमद हीन हाथ
लिख रहे
लिलारे पूंछे प्रश्नों के पत्रक बैताली,
खेत बगीचे तिलहन सूखी मिला न
पानी पानी में
बंटे
किंवाड़े खिड़की घर फरके होहकौरा !
रोजी न रोजगार पिठाहीं लाद
रोज का खुदरा खर्चा
काट रहे दिन
घिसट घिसट के जीवन लगे बेगार,
अन्न दान आवास भीख में मरे न
मोट हुये
पीठ पटीली
लील मेटने तात जलेबी बाटे ठेकेदार,
जबरा मार न रोने दे बिलख बिरौनी
काजल जैसी
आंख
आंख की चितवन बांधे बांह डिठौरा !
कहते कहते कठिन समय की थरथरी
रुके न थरथर हाथ
बहकते पांव
वक्ष की बक्कुर बक्कुर फटती भांख,
मुर्दा तंत्र विनय दिनचर्या एक सुने न
चील
निगाहों का दम देखे
स्वार्थ सिद्धि की दबी गठरिया कांख,
सावन के सब अंधे काटें हरी हरी
हरियरी
रुकें न ऋतुयें
तेज धूप में तपते चौरी चौरा !
भोलानाथ
Monday, 6 April 2026
खुजली खारिश देह खुजाती
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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