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मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...
1 comment:
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....
लौटेंगे
फिर से
खोखल में पांखी
बैठेंगे उड़ उड़
अमुआं की डारी !
मादक रसीले
टपकेंगे
कूँची के महुये
नचती गिलहरी
पतझर से हारी !
बरगद की फुनगी
कोंपल सजेगी
कानों की लटकन सी
इमली की फलियाँ,
फूलेंगी फूलों की
बगिया गुलाबी
गायेंगे भौंरे
मधुबन की गलियाँ,
उजड़े
वनों की
उजड़ी आजादी
अँखुओं सजेगी
कुल्हारियों की मारी !
लौटेंगे
फिर से
खोखल में पांखी
बैठेंगे उड़ उड़
अमुआं की डारी !
मादक रसीले
टपकेंगे
कूँची के महुये
नचती गिलहरी
पतझर से हारी !
सरफरोसी धोबिन
धोएगी मल मल
अपने जिगर के लहू से
दामन का काजल,
किया नालों ने
नदियों को आहत
दूषित किया है
दंभों ने पोखर का जल,
विस्तार पाकर
तलैयाँ
तलबा बनेंगी
हांथों में
थाँमकर कुदारी !
लौटेंगे
फिर से
खोखल में पांखी
बैठेंगे उड़ उड़
अमुआं की डारी !
मादक रसीले
टपकेंगे
कूँची के महुये
नचती गिलहरी
पतझर से हारी !
भूलना नहीं है
हाँकना है
शतरंगी अजगर
बगईचों की छाँव से,
दहशत में तितली
सहमी चिरैया
चापलूस गिरगिट
हाँकना है गाँव से,
सहगान
चुनगुनिया
निर्झर झरेंगे
संगीत सरिता
बहायेगी कोयल दुलारी !
लौटेंगे
फिर से
खोखल में पांखी
बैठेंगे उड़ उड़
अमुआं की डारी !
मादक रसीले
टपकेंगे
कूँची के महुये
नचती गिलहरी
पतझर से हारी !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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