Sunday, 24 March 2013

भोलानाथ के नवगीत [पंथ हीन ]


मेरे अपने सभी नवोदित, वरिष्ठ,और मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक अर्ध भोर रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकर्ण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.............

पंथ हीन मंजिलों की
पापी बेशर्मी
शतरंगी नागिन सी
उगल गई विष पूरा
आईने की आँख पर,
बरगद बर्रोहों के
दर्प द्वेष
मर्माहत अवसाद पर
यहाँ वहाँ बगरे
परनाली गंध भरी पाँख भर !
मिर्ची सी चोंच
ठोंक रही
अपने ही बिम्ब पर पिद्दी गौरैया !!
भोगी कहानी
चोंचों बखानी
गिद्धों की नोची
कउओं की कोली
भूल गई सूरत भूल गई बोली !
उल्लुओं के आचरण
बाजों की शैतानी
चोंच बंधी
और बंधी है
गंधाते छल की देह भर ठिठोली !
नापेगी उड़ उड़
आकाश खाक
चमकेगी बनकर सरग की तरईया !!

आँखों की भेंगी
अकल की अंधी
नरदे में डूबी
कुईयाँ की कोढ़ी गुलरिया,
राधा बनेगी
मीरा बनेगी
धो धो कर ओंठों का जूठन
गदहों की लोरी डबरिया,
गोकुल की कपिला गईया के
चम्पईया कानों में
खोज रही गदबदाई
किलिनियों की
फदफदाई लिखियाँ !
परभक्षी चोंच चपल शातिर
दे दे कर सूरज को धमकी
जालपुरी भीतर की गठरी
दिखाय रही
खोल खोल सखियाँ !
गोबर नहाने
घूरे में बैठी
छोड़ छाँड़ कदम की डरईया !!
पंथ हीन मंजिलों की
पापी बेशर्मी
शतरंगी नागिन सी
उगल गई विष पूरा
आईने की आँख पर !
बरगद बर्रोहों के
दर्प द्वेष
मर्माहत अवसाद पर
यहाँ वहाँ बगरे
परनाली गंध भरी पाँख भर !
मिर्ची सी चोंच
ठोंक रही
अपने ही बिम्ब पर पिद्दी गौरैया !!
भोगी कहानी
चोंचों बखानी
गिद्धों की नोची
कउओं की कोली
भूल गई सूरत भूल गई बोली !
उल्लुओं के आचरण
बाजों की शैतानी
चोंच बंधी
और बंधी है
गंधाते छल की देह भर ठिठोली !
नापेगी उड़ उड़
आकाश खाक
चमकेगी बनकर सरग की तरईया !!

हज करके आई
बिलईयों से सीखे
मक्का मदीने की
नई नई रस्में चिरईया,
महुओं की खोखल में सीरत
तीरथ बगीचे
खोजेगी खोई सूरत
गडवा तलईया,
पंजों के बौने
नाखूनों से लिपटी
गोबर की करसी दिखाकर
गरुणों से
पूछेगी कविता की भाषा !
तरेरेगी आँखें
दिखायेगी घुड़की
सेयेगी तितुरों के अंडे
सिखायेगी शेरों को
वन की परिभाषा !
कीचड़ से लथपथ
पखनों में
अपने भरेगी पूरी जोंधईया !!
पंथ हीन मंजिलों की
पापी बेशर्मी
शतरंगी नागिन सी
उगल गई विष पूरा
आईने की आँख पर,
बरगद बर्रोहों के
दर्प द्वेष
मर्माहत अवसाद पर
यहाँ वहाँ बगरे
परनाली गंध भरी पाँख भर !
मिर्ची सी चोंच
ठोंक रही
अपने ही बिम्ब पर पिद्दी गौरैया !!
भोगी कहानी
चोंचों बखानी
गिद्धों की नोची
कउओं की कोली
भूल गई सूरत भूल गई बोली !
उल्लुओं के आचरण
बाजों की शैतानी
चोंच बंधी
और बंधी है
गंधाते छल की देह भर ठिठोली !
नापेगी उड़ उड़
आकाश खाक
चमकेगी बनकर सरग की तरईया !!

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989139763

3 comments:

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [ भोलानाथ के नवगीत ] said...

खरे सा. आप आदेश करें

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [ भोलानाथ के नवगीत ] said...

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध भोर रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

घोरो ना पानी
पानी में रंगों की
रंग भरी डिबियाँ
पिचकारी भरो ना
कपोलों मलो ना
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया !
आई है होली
अंखियों से खेलें
बनकर के रंगोली
फिजाओं ने
आँचर भिंगोया
अंगिया गुलाबी आगी लगी है
बाँहों के झूले झुलाओ पिया !
शतरंगी रंगों से रंगी है
भीतर की दुनियाँ
आँखों कमल दल
पलकें पलाशी
कोरों का काजल
गुलाबी बनाओ
जूड़े में मेरे गज़रा सजाओ,
अंतर में गूंजे
प्राणों में घोले
मेहंदी की रंगत
ओंठों को नदिया
मन को मछरिया
तन को तलैया
भगोरिया वनों की कोयलिया बनाओ,
हल्दी की उबटन
फागुन का चन्दन
बांगों में फूलों के मेले
ख्वाबों की गाडी में
हम हों अकेले
अनुरागी ताड़ी
पी के मस्ती में हांको पिया !
गा गा कर बाहर
बिस्तर के किस्से
चादर की सिलवट
विज्ञापन बनाकर
दिखाओ टँगाओ न
चौराही बरगद के ऊपर
फागुन को सौंपो फागुनियाँ रागें,
परती दिलों में
बरसो न बनकर
बरसाती बादल
उगेगी थूहर भयानक
अबीरों की आभा
गुलालों की लाली
चुटकी भर सेंधुर हम तुमसे मांगे,
फूहर है भाषा
फूहर है बोली
रंगों की होली मुह भर ठिठोली
कामकेलि रागिनी
चौपाली चरचा
फरका गली में
मतवाली मोरिनी नचाओ न पिया !
आगी लगी है
कोठवा की छानी
बुझती नहीं है बदरी की बानी
चलनी में चालो न
मटकी का दूध मिला पानी
चुल्लू भर सींचो
तो प्यास बुझे मन की,
नदियों नहाई
पलाशी वनों से
फगुआ की रस्में निभाती
मादल नगाड़ों की
मनचली कोरस रसीली
कंचुकी की चौकड़ी
भूल गई सीमायें तन की,
धानी चुनरिया
रंगों से लथपथ
अंगों से लपटी
होली के उत्सव
अधरों में मुक्त हंसी लहरी
भीतरी गोवर्धन
उंगली में अपने उठाओ पिया !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [ भोलानाथ के नवगीत ] said...

मुझे आप अपनी वाल का नाम बता दें आपके साथ चर्चा करना मेरे सोभाग्य की बात होगी ..........भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...