मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्..
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भीतर के फूले
पलाशों की
]छाँव तले
अनछुए प्रसंगों के
कोरे प्रस्तावों पर
रंगों से नाम लिखे,
दूध धुली ओंठों का
गूंगा आमंत्रण
पलकों की भाषा
नैनों की
इतर गंध
फूलों से प्रणय सिखे,
चिर परचित
रागिनी रसीली
जुही
गंध सी
सांस में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
होली के रंग सी
धुल गई
ओंठ की लिपस्टिक
बिन पूँछे आँखों का
पिया प्यार फूला है
भीतर गुलाब सा,
बरसों की
सूखी तलैया भी
देख रही
ख़बरों में मानसून
दरारों में लहराएगा
पानी तालाब सा,
हरी भरी
घाटियों के
पके बाल
लगते हैं
धूप के नहाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
मेड़ो के मंदिर में
झूम रहे
बरगद में
बाँधी थी हमने
कांपती उँगलियों से
मौली फूली डरैया,
मेलों के
शतरंगी सामियाने
उजड़ गये
और बदल गये चेहरे
दिखते नहीं
ठेलों में मूमफली लैया,
पतरोई सी
उड़ती
आँधियों की
आगी
आँख में समाये !
यादों की
खंडहर
हवेली में
रहने को
कोई तो आये !
लीप पोत
आँगन
तुलसी के
चौंरे में
स्वस्तिका रचाये !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763
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